poem
मैंने नहीं उतारा कफ़न
जब वापस लाये उसे , तो एक बक्से में बंद था ।
मैं जोर से चिल्लाई .......
अरे खोलो ये बक्सा , उसका दम घुट जाएगा ।
उन्होंने खोल दिया बक्सा
तिरंगे में लिपटा था ।
मैंने कहा , एक बार शक्ल तो दिखा दो .......
IED ब्लास्ट में बलिदान हुआ है
बलिदानियों की अंतड़ियां निकल के छितरा जाती हैं
चेहरे पे सिर्फ हड्डियां दीखती हैं ,
और मांस के लोथड़े
बलिदानियों के चेहरे नहीं दिखाए जाते उनकी विधवाओं को .....
वो सिर्फ उस तिरंगे में लिपटे हुए पति को
सिर्फ छू भर लिया करती हैं .......
एक आखिरी बार .......
मैंने नहीं उतारा वो कफ़न
बस छू भर लिया था आखिरी बार ।
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