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समर अनार्य / भोपाल गैस कांड

वो 2 दिसंबर की रात- असल में 2 और 3 की दरमियानी रात। शहर भोपाल। नवाबों का शहर। झीलों का शहर। आज भी बाक़ी भारत के तमाम शहरों से अलग, अलहदा, थोड़ा ठिठका हुआ, थोड़ा ठहरा हुआ, थोड़ा क़स्बाई। वो शहर जिसमें सब जोड़ लूँ तो सालों बिताए हैं मैंने। उस रात भी लोग आराम से घर लौटे थे। पर वो रात आसान आम रात नहीं थी। उस रात भोपाल में ज़हर बरसा था, यूनियन कार्बाइड की फ़ैक्ट्री से- मेथाइल आइसो साइनाइट नाम का ज़हर। हज़ारों मारे गए थे, लाखों हमेशा के लिए अपंग हुए, जिन्हें अब एक सावरकर बटा पाँच माफ़ीबाज दिव्यांग कहता है और उनके ज़रूरी सामानों पर जीएसटी 28% कर देता है! ख़ैर, बात 1983 की है सो वापस वहीं-  वो क़त्ल की रात थी। वो जंग की रात थी। वो कायरों की रात थी। वो नायकों की रात थी। सबसे बड़े नायक भारतीय रेल के भोपाल स्टेशन के कर्मचारी, ख़ास  तौर पर स्टेशन मास्टर हुए उस दिन- हादसे के बारे में समझ आते ही अपनी जान पर खेल भोपाल में रुकने वाली हर रेलगाड़ी को रन थ्रू पास कराया।  उस रात डिप्टी स्टेशन मास्टर की ड्यूटी ख़त्म हो चुकी थी पर कुछ काम निपटाने वह अपने कार्यालय में ही थे। किसी काम से बाहर नि...